डोल ग्यारस 2026: कब है डोल ग्यारस? जानें तिथि, पूजा विधि, डोल यात्रा, महत्व और जलझूलनी एकादशी

डोल ग्यारस 2026 कब है? जानें 22 सितंबर की डोल ग्यारस तिथि, पूजा विधि, एकादशी व्रत, डोल यात्रा, जलझूलनी एकादशी का महत्व और परंपराएं।

डोल ग्यारस 2026: कब है डोल ग्यारस? जानें तिथि, पूजा विधि, डोल यात्रा, महत्व और जलझूलनी एकादशी

डोल ग्यारस 2026: तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व, डोल यात्रा और जलझूलनी एकादशी

डोल ग्यारस 2026 हिंदू धर्म और विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात तथा आसपास के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। इसे कई स्थानों पर जलझूलनी एकादशी, जलझिलनी एकादशी, परिवर्तिनी एकादशी या पार्श्व एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु, भगवान कृष्ण या क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार मंदिर के आराध्य देव की विशेष पूजा की जाती है। कई स्थानों पर भगवान की सुसज्जित प्रतिमा को डोल या पालकी में विराजमान करके जलाशय, नदी, कुंड या बावड़ी तक ले जाने की परंपरा होती है। वहां धार्मिक अनुष्ठान और जल से जुड़ी पूजा की जाती है। मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार जलझूलनी डोल ग्यारस उत्सव में सजे हुए कृष्ण विग्रहों को झूले या पालकी में लेकर शोभायात्रा निकाली जाती है और भजन, पारंपरिक नृत्य तथा पूजा होती है।

डोल ग्यारस 2026 कब है?
डोल ग्यारस 2026 की मुख्य जानकारी:

  • पर्व: डोल ग्यारस 2026
  • तारीख: 22 सितंबर 2026
  • दिन: मंगलवार
  • तिथि: भाद्रपद शुक्ल एकादशी
  • अन्य नाम: जलझूलनी एकादशी, जलझिलनी एकादशी, परिवर्तिनी एकादशी, पार्श्व एकादशी
  • मुख्य आराध्य: भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार मंदिर के देवता

पंचांग के अनुसार 2026 में एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात लगभग 8:00 बजे से 22 सितंबर की रात लगभग 9:43 बजे तक रहेगी। इसलिए डोल ग्यारस/परिवर्तिनी एकादशी का प्रमुख पर्व 22 सितंबर को मनाया जाएगा। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।

डोल ग्यारस क्या है?
डोल ग्यारस भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला धार्मिक पर्व है। इसका नाम डोल और ग्यारस, यानी एकादशी, से जुड़ा हुआ है।

इस दिन कई मंदिरों में भगवान की प्रतिमा को सुंदर ढंग से सजाकर डोल या पालकी में विराजमान किया जाता है। भक्त शोभायात्रा के रूप में भगवान को जलाशय या नदी के किनारे ले जाते हैं।

क्षेत्र के अनुसार इस परंपरा का स्वरूप अलग हो सकता है। कहीं भगवान कृष्ण की झांकी निकलती है, तो कहीं भगवान विष्णु या स्थानीय आराध्य देव की प्रतिमा को जल तक ले जाया जाता है।

डोल ग्यारस को जलझूलनी एकादशी क्यों कहते हैं?
डोल ग्यारस को जलझूलनी एकादशी कहे जाने के पीछे जल और भगवान की डोल यात्रा से जुड़ी क्षेत्रीय परंपरा प्रमुख है।

कई स्थानों पर मंदिर से भगवान की प्रतिमा को डोल या पालकी में बैठाकर जलाशय तक ले जाया जाता है। वहां भगवान को जल से संबंधित धार्मिक अनुष्ठान कराए जाते हैं और फिर शोभायात्रा के साथ मंदिर में वापस लाया जाता है।

इसी कारण इस पर्व का संबंध जल, डोल यात्रा और भगवान की भक्ति से विशेष रूप से देखा जाता है।

डोल ग्यारस और परिवर्तिनी एकादशी
डोल ग्यारस को कई पंचांग और धार्मिक परंपराएं परिवर्तिनी एकादशी या पार्श्व एकादशी से जोड़ती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं। परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान के करवट बदलने की मान्यता के कारण इसे परिवर्तिनी या पार्श्व एकादशी कहा जाता है।

2026 में पंचांग के अनुसार परिवर्तिनी/पार्श्व एकादशी 22 सितंबर को है।

डोल ग्यारस का धार्मिक महत्व
डोल ग्यारस भक्तों के लिए भगवान विष्णु और कृष्ण की भक्ति का विशेष अवसर माना जाता है।

इस दिन भक्त:

  • भगवान विष्णु या कृष्ण की पूजा करते हैं।
  • एकादशी व्रत रखते हैं।
  • मंदिरों में दर्शन करते हैं।
  • भजन और कीर्तन करते हैं।
  • भगवान की डोल यात्रा में शामिल होते हैं।
  • जलाशय के किनारे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
  • प्रसाद और भोग अर्पित करते हैं।
  • जरूरतमंदों को दान देते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और भक्ति के साथ एकादशी व्रत और भगवान की पूजा आध्यात्मिक शुद्धि तथा भक्ति भावना को बढ़ाने वाली मानी जाती है।

डोल ग्यारस पूजा विधि
डोल ग्यारस पर पूजा की विधि क्षेत्र और मंदिर की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। घर पर सामान्य रूप से इस प्रकार पूजा की जा सकती है:

1. सुबह स्नान करें

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।

2. पूजा स्थान की सफाई करें

पूजा स्थल को साफ करके भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें।

3. दीपक जलाएं

भगवान के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं और धूप अर्पित करें।

4. भगवान को स्नान कराएं

परंपरा के अनुसार भगवान की प्रतिमा का पंचामृत या शुद्ध जल से अभिषेक किया जा सकता है।

5. फूल और तुलसी अर्पित करें

भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को फूल तथा परंपरा के अनुसार तुलसी दल अर्पित करें।

6. भोग लगाएं

फल, मिठाई और अन्य सात्त्विक प्रसाद भगवान को अर्पित करें।

7. मंत्र जाप करें

भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप करें।

8. कथा और भजन करें

परिवार के साथ एकादशी की कथा सुनें और भगवान के भजन या कीर्तन करें।

9. आरती करें

अंत में भगवान की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

डोल ग्यारस पूजा सामग्री
डोल ग्यारस की पूजा के लिए सामान्य रूप से निम्न सामग्री रखी जा सकती है:

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा/तस्वीर
  • जल
  • पंचामृत
  • तुलसी दल
  • फूल और माला
  • चंदन
  • रोली
  • अक्षत
  • धूप
  • दीपक
  • घी या तेल
  • फल
  • मिठाई
  • माखन-मिश्री
  • नारियल
  • भोग
  • आरती की थाली

मंदिरों में होने वाली डोल यात्रा की सामग्री और परंपराएं स्थानीय रीति के अनुसार अलग हो सकती हैं।

डोल ग्यारस की डोल यात्रा
डोल ग्यारस की सबसे आकर्षक परंपराओं में से एक भगवान की डोल या पालकी यात्रा है।

मंदिर में भगवान की प्रतिमा को फूलों, वस्त्रों और अन्य सजावटी सामग्री से सजाया जाता है। इसके बाद उन्हें डोल या पालकी में विराजमान करके भक्त शोभायात्रा निकालते हैं।

यात्रा के दौरान:

  • भजन-कीर्तन
  • ढोल और पारंपरिक वाद्य
  • धार्मिक झांकियां
  • फूलों की सजावट
  • जयकारे
  • पारंपरिक नृत्य

जैसे आयोजन देखने को मिल सकते हैं।

मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार जलझूलनी डोल ग्यारस उत्सव में भगवान कृष्ण की सजी हुई प्रतिमा को झूले या पालकी में रखकर शोभायात्रा निकाली जाती है।

डोल ग्यारस पर भगवान को जल तक क्यों ले जाते हैं?
कई क्षेत्रों में भगवान की प्रतिमा को जलाशय, नदी, कुंड या बावड़ी तक ले जाने की परंपरा है।

इसे स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान की जल यात्रा या जल से जुड़े अनुष्ठान के रूप में देखा जाता है।

यह परंपरा हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं होती। इसलिए डोल ग्यारस की पूजा और जल यात्रा के नियम स्थानीय मंदिर या परिवार की परंपरा के अनुसार पालन करना उचित माना जाता है।

डोल ग्यारस व्रत
डोल ग्यारस को कई भक्त एकादशी व्रत रखते हैं।

व्रत के प्रकार व्यक्ति की क्षमता और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। कुछ लोग निर्जल या कठोर उपवास करते हैं, जबकि कुछ फलाहार या अन्य अनुमत सात्त्विक भोजन लेते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं वाले लोगों को कठोर उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

डोल ग्यारस पर क्या खाएं?
यदि आप फलाहार व्रत रखते हैं तो अपनी परंपरा के अनुसार इन चीजों का सेवन किया जा सकता है:

  • फल
  • दूध
  • दही
  • मखाना
  • साबूदाना
  • सिंघाड़े का आटा
  • कुट्टू का आटा
  • सूखे मेवे
  • सेंधा नमक

व्रत के भोजन के नियम अलग-अलग संप्रदाय और परिवार में अलग हो सकते हैं।

डोल ग्यारस पर क्या नहीं खाना चाहिए?
एकादशी व्रत की परंपराओं में सामान्य रूप से अनाज और कई प्रकार की दालों से परहेज किया जाता है।

हालांकि, व्रत के नियम क्षेत्र, संप्रदाय और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग या परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करें।

डोल ग्यारस का आध्यात्मिक संदेश
डोल ग्यारस केवल एक धार्मिक शोभायात्रा या व्रत का पर्व नहीं है। यह भक्तों को भगवान के प्रति श्रद्धा, सेवा और सामूहिक भक्ति से जोड़ने का अवसर भी देता है।

इस पर्व से जुड़े प्रमुख आध्यात्मिक भाव हैं:

  • भगवान के प्रति श्रद्धा
  • भक्ति और समर्पण
  • संयम
  • सेवा भावना
  • सामूहिक धार्मिक एकता
  • प्रकृति और जल के प्रति सम्मान

डोल ग्यारस पर क्या करें?
इस दिन भक्त अपनी परंपरा के अनुसार:

  1. सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें।
  2. एकादशी व्रत रखें।
  3. भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का नाम जाप करें।
  4. मंदिर में दर्शन करें।
  5. डोल यात्रा में शामिल हों।
  6. भजन और कीर्तन करें।
  7. सात्त्विक भोग अर्पित करें।
  8. जरूरतमंदों को भोजन या आवश्यक वस्तुएं दान करें।
  9. जल स्रोतों को गंदा न करें।
  10. शाम को भगवान की आरती करें।

डोल ग्यारस पर क्या न करें?
धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन:

  • अनावश्यक विवाद से बचें।
  • नकारात्मक और अपमानजनक व्यवहार से बचें।
  • धार्मिक आयोजनों में गंदगी न फैलाएं।
  • जलाशयों में प्लास्टिक या कचरा न डालें।
  • व्रत अपनी स्वास्थ्य क्षमता से अधिक कठिन न बनाएं।
  • स्थानीय मंदिर और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करें।

डोल ग्यारस के प्रमुख आयोजन
डोल ग्यारस के अवसर पर अलग-अलग क्षेत्रों में बड़े धार्मिक आयोजन होते हैं।

मध्य प्रदेश में Jal Jhulni Dol Gyaras Utsav के दौरान भगवान की सुसज्जित प्रतिमाओं की शोभायात्रा और जल से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में जलझूलनी एकादशी से जुड़े आयोजन भी बड़े स्तर पर होते हैं। पर्यटन विभाग के अनुसार सांवलिया जी मंदिर से संबंधित उत्सव में शोभायात्रा, रथ यात्रा, कुंड तक भगवान की यात्रा, भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होते हैं। 2026 में यह आयोजन 21 से 23 सितंबर तक सूचीबद्ध है।

डोल ग्यारस और भगवान विष्णु की मान्यता
परिवर्तिनी एकादशी के धार्मिक संदर्भ में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

भक्त भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी, चंदन, फल और सात्त्विक भोग अर्पित करते हैं तथा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करते हैं।

डोल ग्यारस की क्षेत्रीय परंपराओं में भगवान कृष्ण या स्थानीय आराध्य देव की पूजा भी प्रमुख हो सकती है।

Frequently Asked Questions – Dol Gyaras 2026
डोल ग्यारस 2026 कब है?

डोल ग्यारस 2026 22 सितंबर 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह भाद्रपद शुक्ल एकादशी के अवसर पर आती है।

डोल ग्यारस को और किस नाम से जाना जाता है?

इसे कई क्षेत्रों में जलझूलनी एकादशी, जलझिलनी एकादशी, परिवर्तिनी एकादशी और पार्श्व एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

डोल ग्यारस पर डोल यात्रा क्या होती है?

डोल यात्रा में भगवान की सुसज्जित प्रतिमा को डोल या पालकी में बैठाकर भक्त शोभायात्रा के रूप में मंदिर से जलाशय या अन्य धार्मिक स्थल तक ले जाते हैं।

डोल ग्यारस पर किस भगवान की पूजा होती है?

क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु, भगवान कृष्ण या मंदिर के स्थानीय आराध्य देव की पूजा की जाती है।

क्या डोल ग्यारस पर एकादशी व्रत रखा जाता है?

हां, क्योंकि यह भाद्रपद शुक्ल एकादशी से जुड़ा पर्व है, इसलिए अनेक भक्त एकादशी व्रत रखते हैं। व्रत के नियम परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं।

डोल ग्यारस को जलझूलनी एकादशी क्यों कहते हैं?

कई क्षेत्रों में भगवान की प्रतिमा को डोल या पालकी में बैठाकर जलाशय तक ले जाने और जल से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा के कारण इसे जलझूलनी एकादशी कहा जाता है।

निष्कर्ष
डोल ग्यारस 2026 22 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व एकादशी व्रत, भगवान विष्णु और कृष्ण की भक्ति, डोल यात्रा, जल से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों, भजन-कीर्तन और सामूहिक धार्मिक उत्सवों के लिए जाना जाता है।

डोल ग्यारस की क्षेत्रीय परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन इस पर्व का मुख्य भाव भक्ति, श्रद्धा, सेवा और भगवान के प्रति समर्पण से जुड़ा हुआ है।

भक्त इस दिन पूजा, व्रत, भजन, डोल यात्रा और दान-पुण्य के माध्यम से पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाते हैं।


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