जानकी जयंती : माँ सीता का दिव्य अवतरण और उनकी शाश्वत आध्यात्मिक शक्ति
जानकी जयंती माता सीता के दिव्य जन्म का पावन पर्व है, जो सनातन धर्म में धैर्य, पवित्रता और नारी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह शुभ तिथि माता सीता के पृथ्वी से प्रकट होने, रामायण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका और धर्म के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को स्मरण कराती है। सीता जयंती हमें त्याग, भक्ति, आंतरिक शक्ति और आध्यात्मिक शांति के शाश्वत संदेश प्रदान करती है, जो भक्तों के जीवन में संतुलन और सकारात्मकता लाने में सहायक है।
जानकी जयंती : माँ सीता का दिव्य अवतरण और उनकी शाश्वत आध्यात्मिक शक्ति
भूमिका
जानकी जयंती केवल एक जन्मोत्सव नहीं है, बल्कि उस दिव्य शक्ति का स्मरण है जिसने धरती पर आकर त्याग, धैर्य और धर्म का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया। माँ सीता, जिन्हें जनकी और वैदेही के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म में नारी शक्ति की जीवंत प्रतीक हैं।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, उनका जीवन स्वयं एक पवित्र ग्रंथ है—जो हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति शोर नहीं मचाती, बल्कि मौन रहकर सहन करती है और अंततः धर्म की विजय सुनिश्चित करती है।
माँ सीता का दिव्य जन्म: धरती से प्रकट हुई शक्ति
रामायण के अनुसार, राजा जनक को यज्ञ हेतु भूमि जोतते समय धरती से एक दिव्य कन्या प्राप्त हुई। यह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं थी—वह स्वयं भूमि देवी की पुत्री थीं। इसी कारण उन्हें भूमिपुत्री कहा गया। माँ सीता का यह अद्भुत जन्म दर्शाता है कि वह प्रकृति की गोद से प्रकट हुई शाश्वत चेतना हैं, जो सृष्टि, स्थिरता और पवित्रता का प्रतीक है।
माँ सीता: मौन शक्ति की सजीव प्रतिमा
माँ सीता को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है—वह शाश्वत शक्ति (शक्ति) हैं। परंतु उनकी शक्ति आक्रोश या विनाश में नहीं, बल्कि सहनशीलता, करुणा और सत्य में प्रकट होती है। वनवास, रावण की कैद और अग्नि परीक्षा जैसे कठोर समय में भी माँ सीता ने धर्म का त्याग नहीं किया। उनका मौन धैर्य यह सिखाता है कि आत्मबल ही सबसे बड़ी शक्ति है।
धैर्य ही शक्ति है : माँ सीता से आध्यात्मिक शिक्षा
सनातन दर्शन में क्षमा और धैर्य को दिव्य गुण माना गया है। माँ सीता ने जीवन की प्रत्येक परीक्षा को धैर्य, विश्वास और संयम के साथ स्वीकार किया। उनका धैर्य कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मा की सर्वोच्च जागृति था। उन्होंने सिखाया कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म पर अडिग रहना ही सच्ची विजय है।
सनातन दर्शन में माँ सीता का शाश्वत अस्तित्व
माँ सीता केवल त्रेता युग की कथा नहीं हैं; वह आत्मा की शुद्ध अवस्था का प्रतीक हैं। जीवन के अंत में उनका पुनः धरती में समा जाना इस बात का संकेत है कि दिव्यता कभी नष्ट नहीं होती—वह केवल अपने मूल में लौट जाती है। वह शक्ति और धर्म के संतुलन की मूर्त रूप हैं।
जानकी जयंती का आध्यात्मिक महत्व
जानकी जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि:
- मौन में भी शक्ति होती है
- धैर्य ही सच्चा बल है
- त्याग आत्मिक उन्नति का मार्ग है
- धर्म के साथ खड़ा रहना ही वास्तविक साधना है
इस दिन माँ सीता की आराधना से गृहस्थ जीवन में शांति, संबंधों में मधुरता और मन में स्थिरता आती है।
जानकी जयंती कैसे मनाएं ?
- “सीता राम” या “श्रीराम जय राम जय जय राम” का जप
- रामायण पाठ या श्रवण
- सादे पुष्प व फल अर्पण
- दया, करुणा और सत्य का पालन
निष्कर्ष
माँ सीता का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति शांत होती है, सच्चा धैर्य मौन होता है और सच्चा धर्म आत्मा से जुड़ा होता है।
जानकी जयंती हमें प्रेरित करती है कि हम भी अपने जीवन में माँ सीता की तरह स्थिर, शुद्ध और धर्मनिष्ठ बनें।
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