फाल्गुन शुक्ल प्रदोष व्रत 2026: तिथि, पूजा समय और महत्व
शुक्ल प्रदोष व्रत का महत्व, पूजा विधि, व्रत नियम, सटीक प्रदोष काल समय और स्वास्थ्य, समृद्धि व मानसिक शांति के आध्यात्मिक लाभ जानें। संपूर्ण जानकारी के लिए Mahakal.com ब्लॉग अवश्य पढ़ें।
शुक्ल प्रदोष व्रत : महत्व, पूजा विधि और आध्यात्मिक लाभ
परिचय
शुक्ल पक्ष प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित अत्यंत पावन और फलदायी व्रत है। वर्ष 2026 में यह पवित्र व्रत 28 फरवरी 2026 की रात 08:05 बजे त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ होने के साथ आरंभ होगा और 01 मार्च 2026 की शाम 06:30 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त होने तक मान्य रहेगा।
इस वर्ष यह व्रत 01 मार्च 2026, रविवार को पड़ रहा है, इसलिए इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाएगा, जिसका विशेष महत्व माना जाता है।
प्रदोष काल, जो सूर्यास्त के बाद का अत्यंत शुभ समय होता है, 01 मार्च 2026 को शाम 05:51 बजे से 08:56 बजे तक रहेगा। इसी काल में भगवान शिव की पूजा, अभिषेक और मंत्र जाप करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
हिंदू परंपरा के अनुसार प्रदोष काल में की गई आराधना से पापों का नाश होता है, मानसिक शांति प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। श्रद्धा, नियम और विधि-विधान से किया गया शुक्ल प्रदोष व्रत भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति तथा भगवान शिव की विशेष कृपा प्रदान करता है।
शुक्ल प्रदोष व्रत क्या है?
प्रदोष व्रत प्रत्येक माह दो बार — शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को रखा जाता है। शुक्ल प्रदोष व्रत बढ़ते चंद्रमा (शुक्ल पक्ष) में आता है, जो सकारात्मक ऊर्जा, विकास और उन्नति का प्रतीक है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रदोष काल में भगवान शिव दिव्य तांडव नृत्य करते हैं और सभी देवता उस अलौकिक क्षण के साक्षी बनते हैं। इस समय की गई पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
शुक्ल प्रदोष व्रत का आध्यात्मिक महत्व
- पाप और नकारात्मक कर्मों से मुक्ति - भक्ति और श्रद्धा से किया गया यह व्रत जीवन की बाधाओं को दूर करता है और कर्मों का शुद्धिकरण करता है।
- स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद - भगवान शिव दुखों का नाश करने वाले हैं। भक्त उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना से यह व्रत रखते हैं।
- वैवाहिक सुख और संबंधों में सामंजस्य - दंपति वैवाहिक जीवन में सुख, प्रेम और स्थिरता के लिए यह व्रत रखते हैं।
- आर्थिक स्थिरता और सफलता - प्रदोष काल में सच्ची श्रद्धा से पूजा करने पर आर्थिक कठिनाइयाँ दूर होती हैं और नए अवसर प्राप्त होते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति और आत्मबोध - यह व्रत ध्यान शक्ति को बढ़ाता है और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करता है।
शुक्ल प्रदोष व्रत की पूजा विधि
1. संकल्प - प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें और दिनभर सात्विक भाव बनाए रखें।
2. उपवास - भक्त पूर्ण या आंशिक उपवास रखते हैं। कुछ लोग केवल फल, दूध या सात्विक आहार ग्रहण करते हैं।
3. संध्या स्नान और तैयारी - प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
4. शिव पूजा - शिवलिंग पर जल और दूध से अभिषेक करें तथा अर्पित करें:
- बेलपत्र
- सफेद पुष्प
- धूप और दीप
- फल और मिष्ठान
5. मंत्र जाप
- “ॐ नमः शिवाय”
- महामृत्युंजय मंत्र
6. प्रदोष व्रत कथा - प्रदोष व्रत कथा का श्रवण या पाठ करने से व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।
7. आरती और प्रार्थना - शिव आरती के साथ व्रत पूर्ण करें और शांति, समृद्धि व कल्याण की प्रार्थना करें।
शुक्ल प्रदोष व्रत के आध्यात्मिक लाभ
1. आंतरिक चेतना का जागरण - उपवास और साधना मन को शुद्ध कर एकाग्रता बढ़ाते हैं।
2. ग्रह दोषों में कमी - मान्यता है कि यह व्रत कुंडली के अशुभ प्रभावों को कम करता है।
3. श्रद्धा और अनुशासन में वृद्धि - नियमित व्रत पालन से मानसिक दृढ़ता और आत्मसंयम बढ़ता है।
4. दिव्य कृपा की प्राप्ति - प्रदोष काल में सच्ची भक्ति से पूजा करने पर भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
शुक्ल प्रदोष का गहरा अर्थ
“प्रदोष” का अर्थ है अंधकार का नाश। यह प्रतीक है अज्ञान और अहंकार को समाप्त कर ज्ञान और प्रकाश को अपनाने का। शुक्ल पक्ष बढ़ते प्रकाश का प्रतीक है, जो जीवन में सकारात्मकता और आध्यात्मिक विस्तार का संकेत देता है।
इस प्रकार शुक्ल प्रदोष व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और परम चेतना से जुड़ने का मार्ग है।
निष्कर्ष
शुक्ल प्रदोष व्रत आत्मा की शुद्धि, भगवान शिव की कृपा और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का पवित्र अवसर है। चाहे भौतिक सुख-समृद्धि की कामना हो या आध्यात्मिक उन्नति की, यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
श्रद्धा, नियम और सच्ची भक्ति के साथ प्रदोष काल में पूजा और मंत्र जाप करने से व्यक्ति शांति, समृद्धि और गहन आध्यात्मिक जागरण का अनुभव कर सकता है।
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