दर्श अमावस्या: महत्व, पूजा विधि और लाभ
दर्श अमावस्या पितृ तर्पण और चंद्र पूजा का पावन दिन है, जिससे पितृ दोष से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
दर्श अमावस्या हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है, जो अमावस्या यानी पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। यह दिन विशेष रूप से चंद्र देव की पूजा और पितरों की तर्पण विधि के लिए समर्पित होता है। माना जाता है कि इस दिन पूर्वज धरती पर आकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं, इसलिए इस दिन पितृ प्रार्थना का विशेष महत्व है।
दर्श अमावस्या का महत्व
दर्श अमावस्या को श्राद्ध की अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन की पूजा से व्यक्ति को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। चंद्र देव भावनाओं के स्वामी हैं और उनकी पूजा से मानसिक शांति व सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही इस दिन किए गए दान और व्रत से पुण्य की प्राप्ति होती है।
पूजा और व्रत विधि
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दर्श अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर गंगाजल या पवित्र जल से स्नान करें।
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घर पर शिव, पार्वती और तुलसी की पूजा करें।
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पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं और पितरों के लिए तर्पण करें।
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मंत्रोच्चार के साथ आटे के बनाए हुए पिंडों का दान करें।
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गरीबों, ब्राह्मणों या साधुओं को भोजन, वस्त्र व अन्न दान करें।
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शाम को ‘ॐ नमः शिवाय’ और ‘ॐ त्र्यंबकं यजामहे’ जैसे मंत्रों का जाप करें।
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खीर, पूरी और मिठाई बनाकर दक्षिण दिशा में रखें।
दर्श अमावस्या के लाभ
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पितृ दोष का निवारण होता है।
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परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
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मानसिक तनाव और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
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जीवन में आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
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पूर्वजों से आशीर्वाद प्राप्त होता है।
दर्श अमावस्या की पूजा विधि और व्रत को सच्चे श्रद्धा भाव से करने पर व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। यह दिन आध्यात्मिक उन्नति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी प्रदान करता है।
इस पर्व की विधिपूर्वक पूजा और तर्पण से न केवल पितरों को मुक्ति मिलती है, बल्कि जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सभी शुभलाभ प्राप्त होते हैं। इसलिए दर्श अमावस्या को श्रद्धा और सावधानी से मनाना चाहिए।
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