जगन्नाथ पुरी में आज भी क्यों उल्टी लटकी है एकादशी? – भगवान जगन्नाथ का रहस्यमयी विधान

यह ब्लॉग जगन्नाथ पुरी की “उलटी एकादशी” के दिव्य रहस्य को उजागर करता है, जहाँ भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद पारंपरिक व्रत-नियमों से परे माना जाता है। प्राचीन कथाओं और गहन भक्ति पर आधारित यह परंपरा दर्शाती है कि सनातन धर्म में कर्मकांड से ऊपर भक्ति को स्थान दिया गया है, और अंततः भगवान की इच्छा ही सर्वोच्च धर्म है।

जगन्नाथ पुरी में आज भी क्यों उल्टी लटकी है एकादशी? – भगवान जगन्नाथ का रहस्यमयी विधान


भूमिका

उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ धाम केवल चारधामों में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के सबसे रहस्यमयी और चमत्कारिक तीर्थ स्थलों में गिना जाता है। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के जीवन की दिशा बदल जाती है और कुंडली में स्थित ग्रहों की दशा तक सुधर जाती है।
इसी पावन धाम से जुड़ा एक ऐसा अद्भुत रहस्य है, जिसे जानकर हर भक्त श्रद्धा से कह उठता है —  “जय जगन्नाथ स्वामी!”
यह रहस्य है — जगन्नाथ पुरी में आज भी एकादशी का उल्टा लटकना।

जगन्नाथ पुरी में एकादशी की अनोखी परंपरा

संपूर्ण भारतवर्ष में एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन अन्न और विशेष रूप से चावल का सेवन वर्जित होता है। परंतु जगन्नाथ पुरी में यह परंपरा बिल्कुल भिन्न है।

यहाँ आश्चर्यजनक रूप से —

  • एकादशी के दिन भगवान जगन्नाथ को चावल का भोग लगाया जाता है।
  • भक्तों को भी महाप्रसाद के रूप में चावल वितरित किया जाता है।
  • इसे पाप नहीं, बल्कि पुण्य माना जाता है।

क्योंकि यहाँ की एकादशी को कहा जाता है — “उल्टी एकादशी”।

“उल्टी एकादशी” के पीछे की पौराणिक कथा

इस अनोखी परंपरा के पीछे एक अत्यंत भावपूर्ण और शिक्षाप्रद कथा प्रचलित है।
एक बार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद ग्रहण करने पुरी आए। किंतु जब वे मंदिर पहुँचे, तब तक भोग समाप्त हो चुका था। केवल एक पत्ते पर कुछ बासी चावल के दाने बचे थे, जिन्हें एक कुत्ता चाट रहा था।
ब्रह्मा जी की भक्ति इतनी सच्ची और निर्मल थी कि उन्होंने बिना किसी संकोच के उसी कुत्ते के साथ बैठकर वे चावल ग्रहण कर लिए।

जब एकादशी ने टोका और भगवान प्रकट हुए

तभी वहाँ एकादशी देवी प्रकट हुईं और बोलीं — “आज एकादशी है और आप चावल ग्रहण कर रहे हैं, यह व्रत का उल्लंघन है।”
इतने में भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हो गए। उन्होंने एकादशी से कहा —
“जहाँ सच्ची भक्ति हो, वहाँ कोई नियम लागू नहीं होता।”

इसके बाद भगवान जगन्नाथ ने यह घोषणा की कि —

  • मेरे महाप्रसाद पर किसी भी व्रत या तिथि का बंधन नहीं रहेगा।
  • यहाँ भक्ति सर्वोपरि होगी, नियम नहीं।

उसी क्षण भगवान ने मंदिर के पीछे एकादशी को उल्टा लटका दिया।

आज भी जीवित है यह दिव्य परंपरा

तभी से लेकर आज तक —

  • पुरी में एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित नहीं है।
  • इसे महाप्रसाद के रूप में श्रद्धा से ग्रहण किया जाता है।
  • यहाँ पंचांग नहीं, भगवान की इच्छा सर्वोच्च मानी जाती है।

यह परंपरा यह सिद्ध करती है कि — भक्ति नियमों से ऊपर होती है।

इस रहस्य का आध्यात्मिक संदेश

जगन्नाथ पुरी की यह परंपरा हमें सिखाती है —

  • ईश्वर भाव देखते हैं, गणना नहीं।
  • सच्ची भक्ति में कोई बंधन नहीं होता।
  • जहाँ प्रभु स्वयं मार्गदर्शन करें, वहाँ नियम स्वयं बदल जाते हैं।

निष्कर्ष

जगन्नाथ पुरी की “उल्टी एकादशी” केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सनातन धर्म की जीवंत शक्ति का प्रतीक है। यह कथा बताती है कि भगवान के लिए सबसे बड़ा धर्म है — सच्ची और निष्कलंक भक्ति।
आज भी लाखों भक्त इस रहस्य को श्रद्धा से स्वीकार करते हैं और मानते हैं कि — जहाँ जगन्नाथ विराजमान हैं, वहीं धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।

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