ज्येष्ठ गौरी आवाहन 2025: तिथि, महत्व, पूजा विधि और विसर्जन
ज्येष्ठ गौरी आवाहन 2025 (31 अगस्त, रविवार) भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को मनाया जाएगा। जानिए गौरी पूजन का महत्व, पूजा विधि, मान्यता और विसर्जन की पूरी जानकारी।

ज्येष्ठ गौरी पूजन का परिचय
हिन्दू धर्म में देवी गौरी का पूजन विशेष स्थान रखता है। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ज्येष्ठ गौरी पूजन बड़े उत्साह और भक्ति भाव से मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से गणेशोत्सव के दौरान आता है और तीन दिनों तक विशेष रूप से मनाया जाता है –
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गौरी आवाहन
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गौरी पूजन
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गौरी विसर्जन
यह पर्व महिलाओं के लिए खास महत्व रखता है क्योंकि इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
गौरी आवाहन कब मनाया जाता है?
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गौरी आवाहन किया जाता है। इस वर्ष 2025 में गौरी आवाहन 31 अगस्त, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं देवी गौरी की मूर्ति घर लाकर उनका भव्य स्वागत करती हैं।
गौरी आवाहन का धार्मिक महत्व
गौरी माता को शक्ति, सौंदर्य और समृद्धि की देवी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि गौरी पूजन से अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख, धन-धान्य और परिवार की उन्नति प्राप्त होती है।
कहानी के अनुसार, जब असुरों के अत्याचार से महिलाएं परेशान थीं, तब उन्होंने माता गौरी की शरण ली। देवी ने उन्हें सुरक्षित किया और दुष्ट शक्तियों का नाश किया। तभी से यह पर्व सुरक्षा, सुख और वैवाहिक सौख्य के लिए विशेष रूप से मनाया जाने लगा।
गौरी आवाहन की विशेषताएँ
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इस दिन महिलाएं स्वयं भी सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनकर देवी की तरह सजती हैं।
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देवी गौरी को गणेश जी के पास बैठाया जाता है, क्योंकि उन्हें भगवान गणेश की माता माना जाता है।
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महाराष्ट्र में इसे बड़े उत्सव और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है।
गौरी आवाहन विधि
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सबसे पहले घर की साफ-सफाई कर पूजा स्थान को सजाएं।
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घर के दरवाजे पर तोरण, हल्दी-कुमकुम और दीपक से स्वागत करें।
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देवी गौरी की दो मूर्तियाँ (माँ पार्वती और अशोकसुंदरी) स्थापित करें।
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उन्हें स्नान कराकर लाल या गुलाबी वस्त्र पहनाएं।
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देवी का सोलह श्रृंगार कर उन्हें गहनों और फूलों से सजाएं।
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कलश स्थापना कर उस पर नारियल और आम के पत्ते रखें।
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देवी को फल, मेवा, मिठाई और पंचामृत अर्पित करें।
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कपूर की आरती कर “ॐ पार्वत्यै नमः” मंत्र का जाप करें।
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दिनभर महिलाएं गीत-संगीत और मंगल गीतों से माता का गुणगान करती हैं।
ज्येष्ठ गौरी आवाहन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि माता गौरी के प्रति भक्ति और कृतज्ञता का उत्सव है। यह पर्व घर-परिवार में सौहार्द, प्रेम और सुख-समृद्धि को बढ़ाता है। महाराष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा में इसका विशेष महत्व है, जिसे आज भी बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
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