कंस वध : श्रीकृष्ण द्वारा अन्याय और अत्याचार का अंत
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस वध कथा धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है। पढ़ें सम्पूर्ण कथा, उसका आध्यात्मिक महत्व और मथुरा में इसका पर्व।
हिंदू धर्म के पौराणिक इतिहास में कंस वध एक महत्वपूर्ण घटना है। यह कथा धर्म की अधर्म पर विजय और सत्य की असत्य पर जीत का अद्भुत प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ही अत्याचारी मामा कंस का वध कर संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया।
कंस कौन था?
कंस मथुरा का राजा था जिसने अपने पिता उग्रसेन को कैद कर के सिंहासन हड़प लिया था। वह क्रूर, घमंडी और निर्दयी था। अपनी बहन देवकी के विवाह पर उसे आकाशवाणी सुनाई दी कि देवकी का आठवां पुत्र ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगा।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म
आकाशवाणी से भयभीत होकर कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। उसने उनके सातों बच्चों को जन्म लेते ही मार डाला। लेकिन आठवें बालक, श्रीकृष्ण, को वसुदेव ने गोकुल पहुँचा दिया, जहाँ माता यशोदा और नंद बाबा ने उनका पालन-पोषण किया।
कंस और उसके अत्याचार
कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए अनेक राक्षस भेजे — पूतना, त्रिणावर्त, और कागासुर जैसे कई असुरों को कृष्ण ने बाल्यावस्था में ही समाप्त कर दिया। वह धीरे-धीरे अपनी ईश्वरीय शक्तियों से पूरे ब्रज को आतंक से मुक्त करते रहे।
कृष्ण का मथुरा आगमन और कंस वध
कंस ने एक दिन श्रीकृष्ण और बलराम को मथुरा में आयोजित धनुष यज्ञ में आमंत्रित किया। वहाँ उन्होंने पहले गजरूप हाथी ‘कुवलयापीड़’ को मारा, फिर कंस के पहलवान चाणूर और मुष्टिक का वध किया। अंत में श्रीकृष्ण सिंहासन पर बैठे कंस के पास पहुँचे और उसे पकड़कर धराशायी कर दिया। कंस का वध कर उन्होंने अपने नाना उग्रसेन को पुनः राजगद्दी पर बैठाया।
आध्यात्मिक संदेश
कंस हमारे भीतर के घमंड, क्रोध, लोभ और अधर्म का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण का वध इस बात का द्योतक है कि जब धर्म और सत्य की शक्ति जागृत होती है, तो कोई भी अन्याय लंबे समय तक टिक नहीं सकता।
कंस वध का पर्व
मथुरा और वृंदावन में कंस वध पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन भव्य झांकियाँ और नाट्य रूपांतरण होते हैं। यह त्योहार भक्तों को यह संदेश देता है कि धर्म की शक्ति अजेय है और अंततः सत्य ही विजयी होता है।
कंस वध न केवल एक पौराणिक कथा है, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी है — जब मानव अपने अंदर के ‘कंस’ को समाप्त कर देता है, तभी सच्चे अर्थों में जीवन में धर्म और प्रकाश का उदय होता है।
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